स्पेस बूम: इसरो के वैज्ञानिकों का क्यों बढ़ रहा है प्राइवेट स्टार्टअप्स की तरफ रुझान? जानिए सैलरी, सुविधाएं और नासा से तुलना
इस बड़े बदलाव के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इसरो में वैज्ञानिकों को कितनी सैलरी और सुविधाएं मिलती हैं
नई दिल्ली:
भारत में इस समय एक ऐतिहासिक 'स्पेस बूम' देखने को मिल रहा है. चंद्रयान-3 और आदित्य-L1 जैसी बड़ी सफलताओं के बाद, देश का प्राइवेट अंतरिक्ष क्षेत्र (Private Space Sector) अभूतपूर्व रफ्तार से पंख फैला रहा है. मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, देश में इस समय 400 से ज्यादा पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जिनमें करीब 500 मिलियन डॉलर (लगभग ₹4,100 करोड़) का भारी-भरकम वैश्विक निवेश आ चुका है.
पिक्सेल, ध्रुवा स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस और अग्निकुल कॉसमॉस जैसी घरेलू कंपनियां आज दुनिया भर में अपनी तकनीक का लोहा मनवा रही हैं. लेकिन इस तेजी से बढ़ते बाजार का असर अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) पर भी दिखने लगा है. हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इसरो के कुछ अनुभवी और वरिष्ठ वैज्ञानिक सरकारी नौकरी छोड़ निजी स्पेस स्टार्टअप्स का रुख कर रहे हैं. खुद इसरो के पूर्व चेयरमैन डॉ. एस. सोमनाथ भी अग्निकुल कॉसमॉस के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में ऑब्जर्वर के रूप में शामिल हुए हैं.
इस बड़े बदलाव के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इसरो में वैज्ञानिकों को कितनी सैलरी और सुविधाएं मिलती हैं, और दुनिया की दिग्गज स्पेस एजेंसियों जैसे नासा (NASA) या ईएसए (ESA) के मुकाबले वे कहां ठहरते हैं?
इसरो में सैलरी का पूरा गणित (7वां वेतन आयोग)
इसरो में एक वैज्ञानिक या इंजीनियर का करियर मुख्य रूप से साइंटिस्ट/इंजीनियर 'SC' पद से शुरू होता है. इसके लिए उम्मीदवार के पास 12वीं में पीसीएम (PCM) और फिर इलेक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल, एयरोस्पेस या कंप्यूटर साइंस जैसे विषयों में बीई/बीटेक या उच्च डिग्री होना अनिवार्य है. इसरो सेंट्रलाइज्ड रिक्रूटमेंट बोर्ड (ICRB) के कड़े इम्तिहान और इंटरव्यू को पास करने के बाद नियुक्त होने वाले वैज्ञानिकों को बेहतरीन सैलरी पैकेज मिलता है:
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शुरुआती स्तर (Scientist 'SC' - पे लेवल 10): इनका मूल वेतन (Basic Pay) ₹56,100 होता है. इसमें महंगाई भत्ता (DA), हाउस रेंट अलाउंस (HRA) और ट्रांसपोर्ट अलाउंस जोड़ने पर शुरुआती मासिक ग्रॉस सैलरी ₹95,000 से ₹1,07,000 तक बैठती है.
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सीनियर वैज्ञानिक (Scientist 'SG'/'SF'): अनुभव बढ़ने के साथ पे-मैट्रिक्स लेवल 13 या 14 के तहत बुनियादी वेतन ₹1,23,100 से ₹1,44,200 हो जाता है, जिससे कुल मासिक आय ₹2 लाख से ₹2.5 लाख से अधिक पहुंच जाती है.
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शीर्ष नेतृत्व (Distinguished Scientist - लेवल 16): इसरो के शीर्ष वैज्ञानिकों का मूल वेतन ₹2,05,400 से ₹2,24,400 के बीच होता है, और भत्तों के साथ इनकी मासिक सैलरी ₹3 लाख से ₹3.5 लाख+ होती है.
मिलने वाली प्रमुख सुविधाएं:
सैलरी के अलावा इसरो वैज्ञानिकों को केंद्र सरकार की ओर से शानदार सुविधाएं दी जाती हैं:
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प्रोफेशनल अपडेट अलाउंस: वैज्ञानिकों को अपनी रिसर्च, किताबें और स्टडी को अपडेट रखने के लिए सालाना विशेष वित्तीय भत्ता मिलता है.
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हेल्थ और पेंशन सुरक्षा: केंद्र सरकार की स्वास्थ्य योजना (CGHS) के तहत खुद और परिवार के लिए मुफ्त चिकित्सा और नई पेंशन योजना (NPS) का लाभ.
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आवास और यात्रा: इसरो के सुरक्षित और सर्वसुविधायुक्त कैंपस में सरकारी क्वार्टर्स और देश भर में यात्रा के लिए लीव ट्रैवल कंसेशन (LTC).
नासा (NASA) और विदेशी स्पेस एजेंसियों से तुलना
यदि हम सिर्फ मुद्रा (Currency) के सीधे तौर पर परिवर्तन को देखें, तो इसरो और पश्चिमी देशों की स्पेस एजेंसियों के वेतन में एक बड़ा फासला नजर आता है:
| स्पेस एजेंसी | औसत सालाना वेतन (भारतीय रुपये में) | मुख्य आकर्षण व भत्ते |
| ISRO (भारत) | ₹12 लाख से ₹30 लाख+ (पद और अनुभव के अनुसार) | उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा, सरकारी नौकरी की सुरक्षा, पेंशन और मेडिकल कवरेज. |
| NASA (अमेरिका) | $70,000 से $150,000+ (करीब ₹58 लाख से ₹1.25 करोड़) | दुनिया का सबसे बड़ा बजट, अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्लोबल प्रोजेक्ट्स. |
| ESA (यूरोप) | €60,000 से €110,000 (करीब ₹55 लाख से ₹1 करोड़) | बहुराष्ट्रीय वर्किंग कल्चर, टैक्स-फ्री अलाउंस या भारी सब्सिडी सुविधाएं. |
विशेषज्ञों का नजरिया (PPP फैक्टर): भले ही डॉलर और यूरो के मुकाबले इसरो के वैज्ञानिकों की सैलरी कम दिखती हो, लेकिन परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) यानी भारत में रहन-सहन और बाजार की लागत के हिसाब से यह वेतन बेहद आकर्षक है. भारत में इस सैलरी के साथ एक वैज्ञानिक बेहद उच्च स्तरीय और सम्मानित जीवन जीता है.
वैज्ञानिकों के प्राइवेट कंपनियों में जाने की असली वजह क्या है?
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने हाल ही में संसद में स्पष्ट किया था कि इसरो का कार्यबल बहुत बड़ा है और "कई लोग आते हैं और कई जाते हैं", जिससे किसी भी राष्ट्रीय प्रोजेक्ट की कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता. लेकिन वैज्ञानिकों के इस पलायन के पीछे केवल बुनियादी सैलरी नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट जगत के कुछ खास आकर्षण हैं:
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स्टॉक ऑप्शंस (ESOPs): प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप्स वैज्ञानिकों को फिक्स सैलरी के साथ कंपनी में हिस्सेदारी (Equity) दे रहे हैं. अगर कंपनी भविष्य में बड़ी सफलता हासिल करती है, तो ये शेयर्स वैज्ञानिकों को करोड़ों की संपत्ति दे सकते हैं.
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फास्ट-पेस वर्किंग कल्चर: सरकारी महकमों में किसी प्रोजेक्ट की मंजूरी के लिए लंबी कागजी कार्रवाई और लालफीताशाही से गुजरना पड़ता है, जबकि स्टार्टअप्स में फैसले चंद दिनों में होते हैं.
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इनोवेशन की आजादी: प्राइवेट सेक्टर में वैज्ञानिकों को नए और रिस्की आइडियाज पर तुरंत काम करने और कम उम्र में ही बड़े प्रोजेक्ट्स को सीधे लीड करने का मौका मिलता है.
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